||ओइम श्री गणेशाय नमः||
राहू केतु का फल कथन का आधार क्रमानुसार क्या माना जाना चाहिए ?
हम सभी जानते है कि राहू केतु ग्रह नही अपितु छायाग्रह है | इसीलिए यह भी संभव नहीं है कि इन्हें किसी भी आधुनिक दूरदर्शी यन्त्र से देखा जा सके |अब प्रश्न उठता है कि इन छायाग्रहों के मूल ग्रह कौन है ! इन ग्रह छाया का अस्तित्व कहा से उत्पन्न हुआ ? उत्तर अवश्य ही चिंतन मार्ग की और धकेलता है |
“सूर्य के मार्ग को जिन दो बिन्दुओ पर चंद्रमा का मार्ग काटता है उसका उपरिवर्ती बिंदु राहू तथा निम्नवर्ती बिंदु केतु कहा जाता है,अर्थात सूर्य चन्द्र की कक्षा परस्पर जिस स्थान पर कटती है अथवा इन प्रकाश पुंज ग्रहों की कक्षाओं का ‘संक्रमण क्षेत्र’ राहू केतु के नाम से प्रसिद्ध है,यह गणितागत काटन बिंदु सदैव एक दूसरे से १८० अंश पर रहते हुए गतिशील है और वक्र गति से चलायमान है,इनकी एक निश्चितगति ,३कला ११ विकला दैनिक है|”
होम सभी भलीभाती जानते है की पृथ्वी ३६५ दिन में सूर्य की परिक्रमा पूर्ण करती है,और चन्द्र लगभग़ २४ घंटे में पृथ्वी की परिक्रमा पूर्ण करता है | आभास यह प्रतीत होता है कि सूर्य चन्द्र पृथ्वी की परिक्रमा कररहे है |
राहू केतु छाया ग्रहों की प्रतिएक मनुष्य के जीवन में अत्यंत प्रभावकारी भूमिका है |क्योकि जीवन के २५ वर्ष इन राहू केतु के संचालन व् आधिपत्य में रहते है |क्योकि १८ वर्ष राहू की व् ७ वर्ष केतु की महादशा से संचालित होते है |साथ ही अन्य सभी ग्रहों की महादशा में भी इनकी अंतर दशा व् प्रतियंतर दशा आती है | यह समय लगभग १९ वर्ष ९ माह १५ दिन का है |समग्रत ४४ वर्ष ९ माह १५ दिन की जीवन अवधि राहू केतु की सुदृष्टि व् कुदृष्टि पर निर्भर होती है | जिस कारण इन छाया ग्रहों की शक्ति व् क्षमता अपरिसीम है | क्योकि इन छाया ग्रहों के कारण ही बड़ा कष्ट कारक योग का जन्म होता है जिसे सभी लोग कालसर्प के रूप में जानते है|
राहू केतु की महत्वपूर्ण स्तिथियाँ एवं दृष्टि, संबंधित मुख्य बिंदु :-
१- सर्वप्रथम व् सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ज्योतिषाचार्यों में राहू केतु की दृष्टि के विषय में मतभेद है |
२- तमौ नाम से भी संबोधित राहू केतु ठोस आकाशी ग्रह न होकर छाया ग्रह है | परन्तु इनका महत्व बहुत होने से इनको नव ग्रहों में स्थान के साथ साथ पूजित भी किया जाता है |
हम सभी जानते है कि प्रकाश का प्रभाव है और छाया का भी ,चाहे वो सकारात्मक हो या नकारात्मक ,क्योकि प्रकाश जीवन ,चेतना और क्रियाशीलता का प्रतीक है तो तम अन्धकार का जो प्रकाश का विपरीत है | सूर्य प्रकाश पुंज है जो चेतना व् जीवन का आधार है जिस कारण सूर्य देव समान तुल्य है |राहू ‘तम’ है इसलिए “असुर” है| उद्धरण के लिए जिस प्रकार कोई बड़ा वृक्षसूर्य के प्रकाश में अवरोध उत्पन्न कर छाया का निर्माण करता है इसलिए उस वृक्ष की छाया तले दूसरे वृक्ष नही पनप पाते जिसके परिणाम स्वरूप वे पेले व् मुरझाए हुए रहते है |इसी प्रकार से राहू जब जन्मकुंडली में किसी भी भाव में विराजमान हो उस स्थान का पतन व् नाश करता है |
३- पाश्चात्य ज्योतिष राहू केतु के महत्व को नही स्वीकार करती ,जबकि भारतीय ज्योतिष की कोई सी भी शाखा हो राहू केतु को आदि काल से ही नवग्रहों में मानती आई है |
४- ज्योतिष के कुछ मुख्य ग्रंथो व् कुछ नाडी ग्रंथो में राहू केतु को उनकी उच्च राशि भी प्रदान की गयी है परन्तु ग्रंथो में मतान्तर होने से कुछ वृष को और कुछ मिथुन को राहू की उच्च राशि मानते है |ठीक इसी क्रम में मतांतर होने से इनकीनीच वृश्चिक व् धनु है | ग्रंथो से ही इनकी स्वराशि का भी वर्णन प्राप्त होता है |
५- अनुभव के आधार पर यही तथ्य सामने आता है कि राहू या केतु जिस भी राशि में हो ,जिस भाव में हो उससे संबंधित विषय वस्तुओ पर पाना कुप्रभाव अवश्य डालता है |यहाँ यह शंका जन्म लेती है कि फिर पराशर होराशास्त्र में महर्षि पराशर ने राहू को शुभ फल दायक (योगकारक) क्यों बताया है |
६- लघु पराशरीके अनुसार
तंमौ ग्रहौ शुभारूढाव संबन्धेन केनचित |
अन्तर्दशानुसारेण भवेतां योग कारकौ ||
इस श्लोक मे स्पष्ट किया है कि वे कौन सी स्थितियां है राहू अपने शुभ फल प्रदान कर जाता है | “शुभ योग कारक ग्रह के साथ सम्बन्ध होने से शुभ फल फल देता है|” जैसे त्रिकोणेश के साथ केंद्र में उपस्थित होने से अथवा केंद्र के स्वामी के साथ त्रिकोण में स्थित होने से ,विशेषकर नवमेश के साथ नवम में होने से योग कारक हो जाता है |
इसी प्रकार यदि हम राहू की वृष या मिथुन राशि मान ले तो उसमे भी हम शुभ फल की कल्पना कर सकते है |परन्तु प्रश्न उठता है कि कब ?क्या सदैव शुभ फल प्राप्त होता रहेगा या नहीं ?
इस चिंतित प्रश्न का निराकरण पराशर ने उपर्यक्त श्लोक में “अन्तर्दशानुसारेण” पद में कर दिया है | अर्थात जब योग कारक ग्रह की महादशा में राहू का अन्तर या राहू की महादशा में योगकारक ग्रह की अन्तर्दशा होगी,उस काल खंड में शुभ फल दे जाएगा |
७- राहू केतु की दृष्टि पर बहुत अन्तर विरोध है जिसका मुख्य कारण कुछ प्राचीन ग्रंथो में राहू केतु की दृष्टि की चर्चा उपस्थित है -

सर्वार्थ चिंतामणि में व्यंकट का श्लोक उपलब्ध है –
क्षीणेन्दु पाप संदृष्टो राहू दृष्टो विशेषतः |
जातो यम पुरं याति दिनैः कतिपयैःकिल ||
अध्याय १०,श्लोक ६६
व्यंकट के पुत्र श्री वद्यनाथ ने जातक परिजात में वर्णित किया है –
सिंहासक स्थिते मंदे राहूणा च निरीक्षिते |
शस्त्र पीड़ा भवेत्तस्य चायुः पञ्च दशाब्दकम् ||
कर्काशकं स्थते मन्दे केतु दृष्टि समन्विते |
सर्प पीडा भवेत्तस्य षोडशाब्दान्मृति भवेत ||
अध्याय ४ श्लोक ५५-५६

इन दोनों ज्योतिष के आचार्यो ने यह कही नहीं लिखा है कि राहू केतु की कौन सि दृष्टि होती है |
ज्योतिष श्याम संग्रह में वर्णित इस श्लोक में वर्णित है कि –
सुतस्ते शुभे पूर्ण दृष्टिम तमस्य तृतीये रिपौ पाद दृष्टिं नितान्तं |
धने राज्य गेहेअधं दृष्टिं बदन्तिं स्वग़ेहे त्रिपादम तथैवाह केतोः||

तात्पर्य यह है कि कुछ ग्रंथो में राहू –केतु की दृष्टि का उल्लेख है और वे दृष्टियाँ पंचम, सप्तम, और नवम बताई गयी है |

इसके अतिरिक्त एकपाद,द्विपाद और त्रिपाद दृष्टि भी मानी गयी है |

बृहज्जातक में ग्रह भेदाध्याय में मात्र इन ग्रहों के नाम का ही उल्लेख है |आगे पूर्ण अध्याय में कही भी इनके विषय में वराह मिहिर ने कोई चर्चा नही प्रस्तुत की है | वराह ने मात्र राहू केतु के नाम का उल्लेख ही किया –
“राहुस्तमोsगुरसुरश्च शिखी च केतु:”
अर्थात राहू के तम,अगु तथा असुर और केतु का शिखी नाम है |
महर्षि पराशर ने राहू केतु के विषय में कहा है कि –
यद्यभाव गतौवापि यद्यभावेश संयुतौ |
तत्तद् फलानी प्रबलौ प्रदिशेतां तमो ग्रहों ||
अर्थात राहू केतु जिस जिस भाव में हो तथा जिस जिस भावेश के साथ युत हो, उसका फल प्रबल रूप से देते है |अर्ताथ इनका स्थान अन्य दिखने वाले ग्रहों से भिन्न है |
एसा ही सुश्लोक शतक में भी वर्णित है –
“यद् ग्रहस्य तु सम्बन्धी तत्फलाय तमो ग्रह:”
अदृश्य ग्रह होने से राहू केतु को किसी राशि का स्वामित्व नही प्राप्त है | राशियों के स्वामित्व की जो बात कही गयी है वह बाद की एक कल्पना है जो संदेहास्पद है |
जाहिर सी बात है कि वस्तुत: राशियों के गुण धर्म स्वभाव के अनुसार ही केवल दृश्यमान पिंडो(ग्रहों)को ही रहियो का आधिपत्यप्रदान किया गया है |जो कि आध्यात्म व् विज्ञानं,दोनों के अनुसार सही परिलक्षित होता है|
अब यदि हम देखे तो पाएगें की जब कक्षा के आधार पर जब सप्ताह के सात दिन निश्चित किये गयें तो द्र्श्य मान ग्रहों के ही किये गए |
जब हम षड्बल गणित का प्रयोग करते है तो राहू और केतु का दृकबल और चेस्टा बल नहीं दिया जाता |ज्योतिष के सभी प्रबुद्ध जानकार जानते है कि अष्टवर्ग में केवल यवन जातक ने इन्हें सम्मलित किया,जबकि अन्य ज्योतिष के किसी भी ग्रन्थकार ने नही |
पराशर के अनुसार इनका दूसरे ग्रहों से सह स्थान सम्बन्ध माना है |दृष्टि का संबंध नहीं |
राहू के केतु के अस्तित्व को सभी ग्रंथकारो ने माना है व उनका प्रभाव चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक प्रतिएक मनुष्य पर होता होता है |
एक पौराणिक कथा के अनुसार राहू केतु की उत्पत्ति का वर्णन :-
महर्षि कश्यप की पत्नी सिंहका ने असमय में ऋषि से एक संतान की इच्छा प्रकट की |असमय की गयी इच्छा से क्रोधित होकर महर्षि ने उसे मृत्यु के देवता जैसा भयभीत करने वाला पुत्र दिया | वही बालक रहू के नाम से जाना जाता है |
जन्म के कुछ समय के बाद उसने अदिति के पुत्र और अपने सौतेले भाई सूर्य से भयंकर युद्ध किया और उसमे बुरी तरह परास्त हुआ | उस अपमान के बाद १० हजार दिव्य वर्षों तक हिमालय की कंदराओ में घोर तप करता रहा |जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने अपना प्रकटीकरण करते हुए राहू से कहा कि –मैं तेरी उग्र तपस्या से अतिप्रसन्न हू अत:तुझे इच्छित वर देना चाहता हू,जो चाहे मांगले राहू जोकि एक अति महत्वाकांक्षी था ,ने ब्रह्मा से कहा की आप एक इसे ग्रह का निर्माण करे जो जीवन,अमरता,देवताओं पर विजय प्राप्त करे तथा सूर्य व् चन्द्र दोनों प्रकाश पुंज है को निगल जाए यही वरदान राहू ने माँगा | ब्रह्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि दोनों प्रकाश पुंजो का ग्रास तेरे लिये बहुत कष्टकारी होगा,परन्तु फिर भी मैं अपने वचनानुसार तुझे वर देता हू |तथा अस्तु कहकर ब्रह्माजी चले गये |अपमान में जलता राहू तुरंत ही सूर्य और चन्द्र की और दौड पड़ा किन्तु बगवान विषाणु ने अपने चक्र द्वारा उसके सिर को धड से अलग कर दिया तथा का कि ब्रह्मा जी द्वारा दिया वचन निष्फल नही होगा |अपने दोनों क्रम में विभन्न क्रम में निगल जाओगे |और इस संसार में अच्छे व् बुरे दोनों प्रकार के परिणामों के सूचक बनोगे |
राहू केतु का अनुभव के आधार पर विवेचन :-
राहू केतु प्रभाव जातक के जीवन में रहस्यमय रहता है अत: फलित करते समय विशेष सजग होते हुए ही फलित करे –
१- राहू का प्रथम स्थान में होना:- राहू का सामान्य प्रभाव की बात करे तो लग्न में स्थित राहू स्त्रियों के लिए शुभ जबकि पुरुषों के लिएअशुभ फल प्रदान करता है |
यदि राहू लग्न में मेष,सिंह और धनु राशियों में संस्थित होकर प्रथम स्थान में विराजमान हो तो जातक अड़ियल,घमंडी ,धनवान,चरित्रहीन और स्वार्थी होता है |जातक के किसी अन्य स्त्री से या विजातीय विवाह की संभावना को बढा देता है |
कर्क कन्या व् मकर में हो तो जातक को धन सम्पति हेरा फेरी से,स्टॉक मार्केट से व् कमीशन ऐजेंट के रूप में या यु कहे कि झटके से धन की प्राप्ति होती है
सिंह राशि में इसके अशुभ परिणाम ज्यादा होते है,क्योकि सिंह राशि का स्वामी सूर्य होता है |
यदि चिकित्सा ज्योतिष के परिवेक्ष में जन्मांग का निर्धारण करते है तो जो अब तक अनुभव में आया है कि जातक को दन्त रोग और मुख रोग अवश्य होता है और उसे बार बार दन्त रोग विशेषज्ञ के पास जाना पड़ता है |
ऐसे जातक को फ़ूड पोइजन का भी खतरा रहता है |
यदि हम इस जातक के जन्मांग को देखे जिसका जन्म ०१/०२/१९९८ को सायं ०७.३० हुआ

इस जातक की कुंडली में राहू लग्न में सिंह राशि का है जिस कारण से राहू पीडित है, जातक स्वभाव से अहंकारी व् निर्दयी है और कृतघ्न है ,जातक की किसी से नही बनती, जातक का चरित्र भी ठीक नही है,जातक अब तक इस छोटी सी उम्र में ३ बार हॉस्पिटल में भरती हो चूका है दो बार फ़ूड पोइजन व् एक बार दुर्घटना के कारण, जातक के साथ यह दुर्घटना नवम्बर २००६ में घटी क्योकि इस समय राहू की अन्तेर्दशा चल रही थी | जातक के लगभग आधे द्दांत इस दुर्घटना में गिर चुके है और जातक को वर्तमान में भी निरंतर दन्त चिकित्सक के पास जाना पड़ रहा है |

राहू धन भाव में उपस्थित होना :- दूसरा स्थान धन, कुटुंब का व् मुख का प्रतिनिधित्व करता है |राहू की २सरे स्थान में उपस्थिति होने से जातक की वाणी दूषित व कठोर होती है,असत्य भाषण, वाणी के द्वारा तनाव उत्पन्न करने वाला होता है |ऐसे जातक की नाक बड़ी होती है,ऐसा जातक स्वयम भी दूसरों की बातो में आकार बिना सोचे समझे ही शीघ्र ही उताजित होजाता है | ऐसे जातक को मुह चलाने के लिए मुख के अंदर कुछ न कुछ चाहिए | ऐसा जातक हमेशा से अनेतिक रूप से धन को कमाने का प्रयास करता रहता है ,यदि इसके साथ कुछ अन्य पाप ग्रहों की दृष्टि या संबंध हो तो जातक अपने धन का नाश भी कर देता है |
राहू का पराक्रम भाव में होना :- राहू इस स्थान में यदि हो तो जातक के समस्त कार्य सराहनीय होते है यह स्थान पराक्रम का स्थान है और राहू चुकी उर्जा का एक पुंज है जो इस भाव में होने से जातक के अंदर गजब का आत्मविश्वास उत्तपन करदेता है |यह जातक को आत्मसयम व् आत्म शक्ति से सदैव ओतप्रोत रखता है | यदि राहू ३ सरे स्थान में पाप ग्रहों के साथ या दृष्टि सम्बन्ध स्थिपित करता है तो जातक दुःशासी व् साथ भाई बहनों का नाश करने वाला होता है |
ऐसा जातक अपने परिवार में सबसे बड़ा या सबसे छोटा होता है अथवा भाईयों में सबसे बड़ा या छोटा होता है |
यदि तृतीय स्थान में राहू हो तो जातक खेल प्रतियोगिताओ में व् खेलो में अग्रणी रह सकता है |

राहू का चतुर्थ भाव में होना :-जन्मांग में अन्य योगो की स्थिति के अनुसार केन्द्र के स्वामी की तरह ही राहू भी बहुत सुंदर परिणाम से लेकर बहुत ही साधारण परिणाम तक देता है | लिकिन दिष्टि विरोध के कारण जो अब तक अनुभव में प्राप्त हुआ है जातक को दुर्भाग्य अप्रसन्नता और संतान हीनता भी देता है | ऐसे जातक के विवाह में भी कोई सामंजस्य नही होता है |
यदि राहू इस स्थान के स्वामी से भी युति करे तो जीवन में दुखांत घटना से एक बार जरूर रूबरू करता है |
यदि चतुर्थ स्थान में राहू मेष,वृषभ ,कर्क कन्या राशि में हो जातक को अच्छे परिणामों की प्राप्ति करता है | जातक के माँ से सम्बन्ध सामान्य ही रहते है|
यदि राहू चतुर्थ भाव में कर्क या कन्या में हो तो जातक को महाप्रतापी व् समाज में सम्मानित बनाता है | उद्धरण के लिए इस जन्मांग को देखे – जातक के जन्मांग में राहू कन्या राशि का है और चतुर्थ स्थान में उपस्थित है और जातक की कुंडली में पूर्ण काल सर्प योग भी उपस्थित है-
१३/०४/१९७८ समय-०९:४५ प्रात: हरिद्वार

जातक समाज में एक लब्ध प्रतिष्ठित व्यक्ति है जातक ज्योतिष व् आध्यात्मिक ज्ञान का विशेषज्ञ है और अपने परिवार में ही रहता है |जातक ने ज्योतिष काज्ञान स्वयं ही बिना किसी गुरु के प्राप्त किया है,जोतिश ककरी करते हुए जातक को मात्र ४ वर्ष ही हुए है और जातक बिना किसी प्रचार के आज उत्तरखंड में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है | जातक के अपनी माँ से सम्बन्ध तो अच्छे है परन्तु माता के विहारो से व् व्यवहार से वो कभी भी संतुस्ट नही रहा है |
चतुर्थ राहू होने से और दशम में सूर्य व् बुध कि उपस्थिति से जो दृष्टि सम्बन्ध बने उसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति औषधि विज्ञानं में स्नातक है और १० वर्षों से इसी क्षेत्र में रहा |और खूब धन व् मान अर्जित किया |
चतुर्थ स्थानगत राहू जातक की प्रारम्भिक शिक्षा में भी बाधा उत्तपन करता है |
यदि राहू मिथुन या कुम्भ राशि में हो तो जातक के पास धन सम्पति प्रचुर मात्र में रहती है परन्तु जातक के पास खुशीयोंका आभाव सदा रहता है |
यदि राहू शुभ ग्रहों से युक्त हो या दृष्टि सम्बन्ध हो तो माता की आयु लंबी होती है |
राहू पंचम स्थान में :-भावत भावं केसिद्धांत के अनुसार पंचम भाव नवम से नवम है अतः पंचम स्थानगत राहू जातक के सौभाग्य शाली होने में अडचने उत्तपन करता है और संतान द्वारा परेशानी पैदा करता है ,स्त्री की कुंडली में राहू पंचम होने पर गर्भ की हानि या सीजेरियन द्वारा संतान की प्राप्ति करता है |
पंचम में राहू हो तो जातक के परसंबंध होने की संभावना प्रबल होती है |क्योकि स्थान पंचम स्थान बुद्धि व् प्रेम संबंधो का भी है ,यदि राहू पंचम में हो तो जातक को कोई भी निर्णय लेने में देर लगता है और जातक की बुद्धि को भ्रमित रखता है |
यदि यहाँ राहू शुभ ग्रहों से युत या दृष्ट हो,शुभ राशि में प्रबल राजयोग कर्क ग्रहों के साथ हो तो व्यक्ति को उत्तम राजयोग प्रदान करता है |
राहू षष्टम भाव में :-राहू ६ स्थान में दुर्घटनाऐ प्रदान करता है,यदि षष्टमेश के साथ राहू की युति हो तो यह परिणाम और भी घातक होते है |यदि इस स्थान में राहू शनि के साथ युति करे तोजीवन भर कष्ट व् समस्याओं से पीछा नही छुट सकता चाहे कितने भी प्रयास आप कर ले |
लेकिन यह भाव कूटनीति का कारक है अतः डॉ k.n.rao के अनुसार राजनितिज्ञो के लिए ६ घर में उपस्थित राहू सुंदर फल देता है |
परन्तु मेरा अनुभव में जातक के जीवन में वह अवश्य ही एक बार अधोगति में अवश्य जाता है,और किसी अभीयोग का सामना उसे अवश्य करना पड़ता है |
राहू सप्तम भाव में :-सप्तम भाव कलत्र भाव है,यहाँ राहू का होना शुभ नही है,राहू का यहाँ होना जातक के छवि को व् चरित्र को विवादस्पद बनाता है ,जातक वेश्यागामी व् अन्यस्त्रियों में अनुरक्त होता है,सप्तम का राहू व्यक्ति को उदर से सम्बंधित रोग विशेषकर आंतों से जुड़े रोग हर्निया से ग्रषित कर देता है,यदि यहाँ शनि या रवि से युक्ति हो तो जातक के विवाह में विलम्ब व् काफी अडचने पैदा करता है | जातक के अंदर शनि व् राहू की सप्त में युति वैराग्य भी उत्पन करदेती है |
जातक को कभी भी वैवाहिक सुख की प्राप्ति नही हो पाती |
राहू अष्टम भाव में :-राहू का अष्टम में होना जातक कोकाम पीडित बनाता है जातक को रति के कारण असाध्य रोग होने की पुन सम्भावना रहती है |जातक का मित्र वर्ग कुलीन नही होता है | जातक कायर,उतावला होता है |यदि जन्मांग में शुभ योग उपस्थित हो और राहू उनसे प्रभावित हो तो जातक को प्रशासन से व् राजनैतिक कारणों से धन लाभ प्राप्त होता है | ऐसा जातक वृद्धावस्थामें सुखी होता है |मान सम्मान की प्राप्ति होती है |
अष्टम भाव में मेरे अनुभव से पुरुष राशि का राहू उत्तम परिणाम न देकर अशुभ परिणामों की वृद्धि करता है | अष्टम स्थान का राहू अवैध सम्बन्ध व् अवैध धन कमाने की और भी अग्रसर करता है |
जबकि स्त्री राशि गत राहू जातक में सहनशीलता और सौभाग्यवती व् धनि पत्नी प्राप्त करता है |ऐसे जातक की पत्नी की मृत्यु पहले होती है |
अष्टम गत राहू यदि पापी गृह के साथ हो तो दुर्घटना में अंगहानि व् अपनी दशा में शत्रु द्वारा शस्त्र द्वारा शारीरिक नुक्सान भी देता है |
राहू नवम भाव में :- राहू यहाँ यदि शुभ ग्रहों के सानिध्य में हो तो जातक अच्छा विद्यार्थी,सदाचारी, धर्म व् संस्कृति परायण,वाणी का ओजस्वी,सुसंस्कृत,और ईश्वरवादी होता है |एक विशेष बात ऐसा जातक अपने धर्म से ज्यादा दूसरे धर्म व् सम्प्रदाय में अधिक निष्ठा प्रदर्शित करता है|
राहू यहाँ बुरा होकर भी ज्यादा बुरे परिणाम नही देता है ,अनुभव में आया है कि नवंम राहू जीवन में एकबार अवश्य ही व्यक्ति को अधोगति की ओर धकेलता है | अशुभ राशि या पापी ग्रहों की दृष्टि भी नवमस्थ राहू पर होने से जातक सच्चाई,व्यवहार और भाग्य और धर्म विद्वता की चाहत जातक के अंदर उत्पन्न करता है |
दशम में राहू :- दशम का राहू व्यक्ति को यान्त्रिकी ज्ञान से सुशोभित करता है,ऐसा जातक कठिन से कठिन कार्य को करने से घबराते और कई बार असफल होने पर भी अन्त्वोगत्वा सफलता का स्वाद अवश्य चखते है |दशम में राहू अपनी महादशा में राजयोग प्रदान करताहै यदि शुभ ग्रहों के द्वारा पोषित होने पर ,यदि कटु ग्रहों के दृष्टि सम्बंध होने पर भी राजयोग तो मिलता है परन्तु परिणाम अस्पष्ट व् समय से देर से प्राप्त होते है |
यदि दशम भाव में राहू सूर्य युति हो तो जातक को जीवन भर आर्थिक रूप से कष्ट रहते है | शुभ ग्रहों से युति होने व् दृष्टि सम्बन्ध होने पर जातक समाज का लब्ध प्रतिष्ठित गणमान्य होता है , देश विदेशो की यात्रा करने वाला होता है,शिक्षित होता है |ऐसा जातक बातुनी ,अहंकार से त्रस्त होता है |
यदि राहू व् चन्द्र की युति दशम में हो तो अथवा राहू के निकट हो तो व्यक्ति के अंदर कल्पनाओ का व् अव्यवहारिक दृष्टिकोण होता है |
यदि राहू केतु के अक्ष पर नीच का नवमेश या दशमेश हो तो जातक को कपटी धोखेबाज़ी व् रहस्यमयी चरित्र का पालक बनाता है |
राहू की उपस्थिति एकादश भाव में:- राहू यहाँ सुंदर परिणाम देता है |जातक तेज औजारों,यंत्रो व् हथियार के प्रयोग में विशेषज्ञ होता है अनुभव में आया है कि अधिकांशत ऐसे जातक सेना में या सेना के स्वास्थ्य कोर में कुशल शल्य चिकित्सक होते है या सर्जिकल यंत्रो के निर्माता ,खराद मशीन के संचालक और अभियंता होते है |
एकादश का राहू जातक जातक को वेदेश में वास करता है जातक का भाग्य उदय भी अपने जन्म स्थान से दूर ही होता है |जातक देखेने में सुंदर आकर्षक व् दयालु स्वभाव का होता है |ऐसा अनुभव में आया है की ऐसा जातक अपने माता पिता की अकेली संतान अथवा भाई बहनों में सबसे बड़ा या सबसे छोटा होता है |एकादश का राहू जातक को अकूत धन सम्पति प्रदान करता है |
राहू की द्वादश स्थान में उपस्थिति :- १२वे स्थान से वेदेश यात्रा शय्या सुख का बोध होता है,जब जातक के जन्मांग में राहू १२वे स्थान में हो तो जातक को स्त्री सुख विवाह में विलम्ब आदि प्रदान करता है,राहू प्रथकताजनक ग्रह है जिस कारण या तो जातक स्वयं परिवार में होते हुए भी परिवार का त्याग कर देता है या जातक का परिवार ही उसे त्याग देता है | १२ वे स्थान का राहू जातक के वेदेश यात्रा के योग प्रबल करता है| चिकित्सा ज्योतिष की दृष्टि से ऐसे जातक को दन्त से,नाखूनो से पैरो में तकलीफ और टी.बी. के रोग की संभावना रहती है |

विशेष सूत्र राहू के संदर्भ में –
तृतीय षष्टम अथवा एकादश भाव में राहू की सुस्थिति सभी नकारात्मक व् बुरे प्रभावों से मुक्त रखती है और राहू इन स्थानों में बल भी प्रदान करता है |
राहू इन अधोलोखित लग्नों में केंद्र या त्रिकोण में स्थित होने पर शुभ परिणाम देता है |
अ- बुध की राशियों में मिथुन व कन्या में
आ- लग्न में मेष वृष अथवा कर्क राशि में
राहू की महादशाअंतर्दशा कापरिणाम :-
राहू गुरु ,राहू शुक्र ,राहू बुध की दशा सामान्यत: शुभ फल देने वाली होती है | परन्तु राहू शुक्र की दशा अंतर्दशा में अधिक संघर्ष होते है |
जबकि राहू बुध की अंतर्दशा में व्यक्ति की बुद्धि भ्रमित हो जाती है ,और जातक सही निर्णय के आभाव में नुक्सान उठता है |
जब शनि की महादशा में राहू की अन्तर्दशा होती है तो समय स्तिथिया प्रतिकूल होजाती है और अपने भी साथ नही देते है |

केतु का विभिन्न भावो में फलविवेचन :-
केतु केवल उर्जा का श्रोत है केतु के पास कोई भी संवेदनशील अंग नही है सभी संवेदी अंग राहू के पास है केतु तो मात्र जीवित उर्जा एक का स्रोत है | जिसकारण बार बार होने वाला गंभीर और रहस्यमयी रोग का जनक केतु ही है |
यदि केतु अष्ठम में गुरु या शनि के साथ युति सम्बन्ध रखता है तो यह स्थिति जातक को कैंसर होने कि संभावना अधिक रहती है |
मिथुन राशि में केतु नीच का होकर विराजमान होतो अशुभ परिणाम प्रदान करता है | मिथुन राशि वायु तत्व की राशि होने से होने जब केतु होता है तो विकट रूप में अस्थमा का अटैक बार बार उग्र रूप में उठता है | टी.बी.,फेफडो का कंसर नवजात बच्चो में निमोनिया की संभावना अधिक बढ़ जाती है जब केतु इस रही में होकर ४थे स्थान में विराजमान हो |
केतु का प्रथम स्थानगत होना :-केतु का पथम स्थान गत होना और प्रतिकूल नक्षत्र में होना परिवारिक लोगो से व् सम्बन्धियों से परेशानियां,व्यग्रता ,दन्त रोग ,पत्नी के उदर संबंधी रोग से परेशानी |प्रशासन का भय व् दंड या प्रतिकूल प्रिविष्टि ,पत्नी द्वारा नियंत्रित,कोई भी निर्णय अकेले लेने में अक्षम होता है |
यदि केतु मेष मिथुन कन्या राशि में हो तो अतिथि सत्कार ,धन सम्पति और खुशीयों में बढोत्तरी भी करता है |
मकर अथवा कुम्भ राशि का केतु भू सम्पति और उत्तम पुत्र की प्राप्ति करता है |
केतु कैव्लय करक है ,यदि कर्क राशि का होकर चंद्रमा के साथ लग्न में उपस्थित हो तो तीव्र उत्साह और धर्म निष्ठा प्रदान करता है |
पीडित केतु प्रथम स्थान में मष्तिष्क में रक्त का थक्का {ब्रेनहेमोरेज}, दिमागीबुखार {मेनिनजाइटिस},मष्तिष्क में अबुर्द {ब्रेन टियूमर} ,पक्षाघात व् टिटनेस से मृत्यु का कारण बनता है
केतु का द्वित्य स्थान में होना :- द्वित्य भाव में केतु पारिवारिक जीवन में खलल डालता है ,वाणी दोष का का एक प्रमुख कारण पीडित होने पर होसकता है| केतु का इस भाव में होना आखों से संबंधित गंभीर रोग भी प्रदान करता है |
इस स्थान में केतु का होना जातक को धन व् अचल सम्पति प्रदान करता है परन्तु प्रशासन द्वारा धन हानि भी देता है |कुटुम्बपरिवार में सामंजस्य नही बैठ पता |
केतु का तृतीय भाव में होना:- इस भाव में केतु अत्यधिक खुशियाँ प्रदान करता है,परन्तु मानसिक रूप से तनाव ग्रस्त भी करता है सहोदरो के प्रति भी जातक शत्रुतापूर्ण बर्ताव रखता है |यहाँ यदि केतु अपनी स्वराशि या उच्च का हो तो जातक अपने शत्रुओं का नाश करने वाला ,प्रसिद्धि व् खुशियां पाने वाला होता होता है | तथा शूरवीर और धर्मपरायण होता है |
केतु तृतीय स्थान में नीच का हो तो मानसिक तनाव व् कष्ट ,बंधुओं व् पड़ोसियों से समस्याएं देता है |यदि मंगल और केतु सिंह राशि में होकर विराजमान हो तो व्यक्ति के सिर कीशल्य क्रिया या और यदि शुभ प्रभाव से वंचित हो तो अधिकांशत मृत्यु देता है|केतु का तृतीयभाव में होनाऔर पीडित होना जातक की मृत्यु शिरोछेदन के द्वारा करता है|
इस तथ्य को इस उदहारण द्वारा देखे कि एक हालीवुड की प्रसिद्ध अभिनेत्री जेन मानसी फील्ड का सामूहिक दुराचार करके सिर को धड से अलग कर हत्या कर दीगयी|

तृतीय भाव मष्तिष्क का नियंत्रक भाव भी है और जातक के अंदर उर्जा संतुलन को भी प्रदर्शित करता है |इस भाव में यदि केतु शनि के साथ हो तो व्यक्ति का मानसिक स्थिति का ये ब्रोषा नही कि वो कब सदू बंजाएय और कब शैतान | ऐसे जातक समाज की मुख्य धारा से कटे रहते है चाहे वो सन्यासी बनकर या जरायम की दुनिया में संलिप्त रहकर |
केतु चतुर्थ भाव में :- ऐसे जातक को माता से पूर्ण सुख नही मिल पता माता से मिलने वाली सहायता का आभाव रहता है |जातक का विकास व् वृद्धि जन्म स्थान से दूरहोता है |
यदि केतु अपनी राशि मीन या उच्च राशि धनु में हो तो राजयोग अनुकूल परिणाम प्राप्त होते है | यदि वृश्चिक या सिंग में हो तो माता पिता से अत्यधिक लाभ व् सहायता प्राप्त होती है |
केतु का पंचम स्थान में होना:- केतु का पंचम् में होना अल्प शिक्षा ,या शिक्षा में रुकावट के साथ, गर्भपात या सिजेरियन चॉइल्ड की संभावना बनाता है |पुत्र संतान से सम्बन्ध तनाव पूर्ण रहते है और विचारों में मतभेद रहते है |जातक को उचे स्थान से खतरा होता है और सिर पर चोट लगने की सम्भावना रहती है | जातक विचारों से धूर्त ईर्ष्यालु ,आवश्यकता पड़ने पर धोखा देने वाला होता है | कन्या संतति की अधिकता रहती है पुत्र संतान कम ही होती है |जातक को उदर रोग परेशान करते रहते है |
हा यदि केतु सिंह में ,मीन में या वृश्चिक में होकर पंचम स्थान में हो तो राजयोग भी प्रदान करता है |और जातक प्रभावशाली ढंग से धार्मिक व्याख्यान देता है |
केतु की उपस्थिति षष्टम भाव में :-ऐसा जातक रोग मुक्त चिंतामुक्त धनवान एश्वर्यशाली वादविवाद में न हरने वाला ,उदारमना और सबका प्यारा होता है |और जातक के मामा उसकी हर तरह से सहायता प्रदान करते है |परन्तु ऐसे जातक को शारीरिक पीड़ा अवश्य ही रहती है और जातक किसी के द्वारा भी किये हुए एहसान को नही मानता है |
केतु का सप्तम भाव में होना :- जातक को यात्राओं की अधिकता रहेगी और उनसे कष्ट होगा जातक को धन हानि ,चोर व् शत्रुओ से कष्ट व् जातक को लूटपाट से हानि होती है | जातक का चरित्र संदेहास्पद होता है और जातक की पत्नी को गुप्तप्रदेश के रोग होते है |
केतु अष्टम भाव में उपस्थिति :-इस स्थान में केतु पिता का अल्प सुख ,कफ संबंधित रोग,श्वास के रोग ,अपच ,भगंदर आदि रोगों से परेशान कर सकता है |यदि केतु अपनी स्वराशियों में या मित्र राशियों में होतो धन सम्पति का लाभ कराता है |
नवम भाव में केतु :-जातक के पिता को भय व् खतरा रहता है | अनुभव में आया है कि ऐसा जातक धर्म परिवर्तन करने में और अपने धर्म से अधिक दूसरे धरम में विश्वास करता है |नवम का केतु जातक को अमानत में खयानत करने वाला बनाता है एक जातक विशवास के काबिल नही होता यदि केतु की स्थिति उत्तम न हो और केतु पीडत हो |
केतु का स्वराशि में या अपनी उच्च राशि में होकर नवम भाव में होना यह दर्शाता है कि जातक का भाग्य विदेशीयों द्वारा या संतो द्वारा होता है | जातक को राहू राजनीतिक सफलता का योग व् सरकार में उच्च पद पर भी आसीन कराता है यदि इस पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो |
केतु का दशम भाव में होना :-केतु का दशम भाव में होना जातक को वाहन से खतरा और उससे गिरना ,परन्तु जीवन में आध्यात्मिक होना व् रोजगार में परिवर्तन का निरंतर क्रम चलाना होता रहता है |जातक को पिता से आपेक्षिक सहयोग नही प्राप्त होता है |जातक स्वयं के कर्मो में विश्वास रखता है और आगे बढ़ता है | बुद्धिमानी में ऐसे जातक का व् तर्क वितर्क में कोई सानी नही होता |
केतु एकादश भाव में:-सभी कार्यों से लाभ और सफलता प्राप्त होती है,जातकभाग्यशाली,आकर्षक
और सुंदर व् नए परिपाठी के वस्त्रों को पहनने का शौक़ीन होता है |
केतु का द्वादश भाव में होना :- एक जातक जिसके जन्मांग में केतु १२वे घर में हो और शत्रु राशि में हो तो जातक कुकर्म करने वाला व् इन कार्यों में धन व् सम्पति को लुटाने वाला होता है |एके जातक की विदेश यात्रा के योग भी केतु बनाता है |यदि बुध के साथ १२वे घर में युति हो तो जातक के चत्रित का सही अनुमान लगाना कठिन होता है १२व केतु जातक को आपराधिक मामलो में वांछनीय भी बनाता है और यदि शुभ ग्रहों की दृष्टि होतो जातक सन्यासी भी बन जाता है |
केतु महादशा उपचार
अगर आप केतु की महादशा से पीड़ित हैं तो इसके उपचार के लिए लकड़ी केक चार टुकड़े चार दिन तक बहते पानी में प्रवाहित करना चाहिए. कन्याओं को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करना चाहिए. ग़रीब अथवा ब्रह्मणों को कम्बल दान करना चाहिए. प्रतिदिन गणेश जी पूजा करनी चाहिए और गणपति जी को लड्डू का भोग लगाना चाहिए. बहते जल में कोयले के 21 टुकड़े प्रवाहित करना चाहिए. दाएं हाथ की मध्यमा उंगली में लहसुनियां चांदी में धारण करना चाहिए.
इसी के साथ मैं अपनी लेखनी को विराम देता हू कि हे माँ मुझ अल्पज्ञानी से जो कुछ त्रुटी हुई है उसे मैं कभी भविष्य न करू और अपने इष्ट गुरुओ व् आपका सदा ऋणी रहू |

प.अंकित कुमार धीमान फार्मासिस्ट सिद्धांतज्योतिषाचार्य,पुत्र श्री भोमदत्तआर्य, कुसुम विहार कॉलोनी ,कोतवाली रोड, नजीबाबाद २४६७६३ जिला बिजनौर ,उत्तरप्रदेश
चलभाष -०९८९७६३६६९५,०९४१२८२३८४६

लालकिताब जोशी के द्वारा लिखित ज्योतिष का एक अमूल्य ग्रन्थ है ,जिसका प्रचलन आज के समय में बहुत तेजी से बढ़ा है ,और जब कोई भी चीज प्रसिद्धि प्राप्त कर लेती है तो उसका लाभ और लोंगो कों फायदा पहुचाने के नाम पर कुछ लोभी लोग जिनका नाम या जिक्र करके मैं अपनी लेखनी कों दूषित नही करुगा |भारत कुछ हि सही अर्थो में बहुत ही अच्छे लालकिताब के ज्योतिषी है लिकिन जो आजकल लोकल चेनलों और राष्ट्रीय चेनलों पर केवल सॉफ्टवेयर से हि कुडली व फलित छापलार लोंगो की जेब काट रहे है ,कुछ तो अपने आप हि गलत सलत लालकिताब के वाक्यांशों का उलटा सीधा आर्ट करके लोंगो कों गुमराह कर रहे यहाँ तलक कि youtube पर भी अपनी वीडियो बनाकर सजा रखी है |यहाँ एक कहावत चरित्रार्थ है कि नाच न जाने आंगन टेढा | अरे ज्योतिष कि कोई सी भी पद्धति हो ज्ञान कों उत्तम मांगती है लोंगो कों मुर्ख बनाना और उनसे पैसा ठगना आज के समय में बस यही इनका मूल मंत्र है | मगर इन चंद लालकिताब के गद्दारों ने वैदिक ज्योतिष में भी लालकिताब का उपचार थमा रखा है | उल्टी सीधी व्याख्या देना और अपने कुछ ऐसे चमचों के द्वारा अपनी महिमा कों छदम रूप में सही करार देना और यदि कोई इनकी गलती पर सिद्धांतों के द्वारा यदि किसी विद्वान ने टिपण्णी कि तो पागल स्वान कि तरह अपने चमचों कों भोकने के लिए छोड़ देते है |हमारा प्रयास बस यही है कि आप सही ज्योतिष के विशेषज्ञों से राय ले चाहे वो कोई भी हो और इन ढोंगी जोकरो और उनसे प्रीत रखने वाले यानि कि उनके चमचों से बचाओ आने कों भी और ज्योतिष कों भी |
धन्यवाद
ज्योतिष का प्रेमी

||ओइम श्री गणेशाय नमः||

विपुल शर्मा जी आपकी लालकिताब में काफी रूचि होने के कारण मेरी भी इच्छा हुई कि आपको लालकिताब के कुछ लिख कर दू ,ज्यादा ज्ञानी तों मैं नही हू किन्तु मेरी ईष्ट और गुरुओंकी कृपा से जो कुछ भी सीख पाया हू लिखने का प्रयास मात्र है|
लालकिताब का टेवा श्री विपुल कुमार जी का

विपुल जी लालकिताब के अनुसार आप का जीवन एकांतिक होते हुए भी एकांतिक नही है |मन आप का बहुत है चलायमान है आप का मन हर उस और भागता है जहां से आप कुछ प्राप्त कर सके |जीवन में आप सदेव विचारों से द्वन्द करते है कई मौको पर खुद कों भ्रमित भी महसूस करते है |
विपुल जी लालकिताब के अनुसार आप हमेशा नए रास्तें की तलाश में रहगे |आपकी मित्रता का दायरा बड़ा रह सकता है और उसमे अधिकांश तह ऐसे लोग होसकते है जो अपने जीवन में वर्तमान में भी काफी संघर्ष कर रहे हो एक और खास बात आपके बारे में कि आपको दूसरों के बारे में आवश्यकता से अधिक जानने की उत्सुकता बहुत रहती है,उसके बाद उनलोगों ज्यादा बिना कुछ जाने हि गलत मूल्याँकन करने और चुगली करने की व बुराई करने की आपके अंदर बहुत हि गन्दी आदत अगर रहती है तों आप जीवन में कभी भी अपने व्यवसाय में उत्तम प्रगति नही कर पाएगेआपको परनिंदा में अपार सुख की प्राप्ति होसकती है | विपुल जी आप लोंगो की मदद कों हमेशा त्यार रहते है मगर उसमे भी आप अपना किया हुआ एहसान गिनना नही भूलते | आप कों दूसरों में दोषारोपण करने और दूसरों की अच्छाइयों कों भी बुरे रूप में प्रस्तुत करने का एक खास गुण मौजूद है यदि ऐसी स्थिति आपके साथ है तों अवश्य हि आप गुप्त रोगों से ग्रषित हो सकते है |इस स्थिति से बचने के लिए लालकिताब कुछ उपाय और परहेज बताती है यदि आप कर सकते है तों अवश्य हि करे -
परहेज -
१- दूसरों की आलोचनाओं कों करने से बचे |
२- झूट व पाखंड से बचे और दूसरों के प्रति दुर्भावना का संचार करने से बचे |

उपाय -१- नित्य केशर का तिलक दूध में मिलाकर मस्तक पर लगाए |
२- लगातार ४३ दिन तांबे के सिक्के बहते जल में बहाए |
३- मसूर कों धर्मस्थल में दान दे |

चुकी आपकी टेवा में महाराज विपुल कुमार जी सूर्य व बुध १२ घर में है जो साफ़ तौर पर जताता है कि आपके माता पिता का सुख आपके लिए क्षीणहै | लालकिताब के मुतालिक ये दोनों ग्रह मिलकर बृहस्पति की तरह फल देते है |इसकारण ३९वे साल तक आपको इनके शुभ परिणाम अधिक मात्र में प्राप्त होगे |भाग्यौद्य तों जल्द हि होगा और उसका लाभ कुछ आपकी नादानियो की वजह से कमजोर हुए सूर्य के कारण नही मिलपाएगा |इस कारण सूर्य कों बली और मजबूत करने के लिए शरीर पर सोना व ताम्बे का सिक्का धारण करने से सूर्य का अच्छा फल प्राप्त होगा क्योकि सूर्य व बुध की दृष्टि ६टे भवन पर होने से आप के शत्रु आपको मानसिक कष्ट व परेशान ज्यादा कर सकते है |सरकारी अमला या यु कहे कि तबके के लोंगो से आपको मानसिक परेशानी व दिक्कत रह सकती है |यदि मैं यहाँ वैदिक कुंडली केअनुसार भी जिक्र करू तों सूर्य की यह स्थिति भाग्यभंग योग का निर्माण करती है |जिस कारण से आपको अपने भाग्युद्य हेतु काफी संघर्ष करना पड़ सकता है |बुध कासूर्य के साथ होना नसों से सम्बंधित रोग अवश्य देता है | परिवार के संदर्भ में बुध से सम्बंधित सभी वस्तुए ,संबंधियो और व्यपार के बेकार के खर्चो का बोझ आप अपर पड़ सकता है इस कारण आप ये सूर्य व बुध के उपाय करे यदि लाब लेना चाहते है
१- झूट व बुराई करने से बचे
२-लाल मुख के बंदर कों लगातार ४३ इतवार गुड व चना खिलाए
कुछ उपाय जो ऊपर दिए है वो भीयहाँ मदद है इस कारण उन्हें यहाँ दोबारा से नही लिख रहा हू |
आपकी कुंडली में बृहस्पत मंगल और केतु तीनो कर्म के घर में अपनी मौजूदगी बया करते है यह आपको जिस्मानी और रूहानी आपको चैन से नही रहने देते,दिमाग हर वक्त कभी किसी न किसी उधेड़बुन में रहता है और जिस्म भी स्कुनियत से नही टिकता, दिमाग में फितूर बैचेनी और काम में बदलाव की मंशा जाहिर होती रहती है यनी कि आपका विपुल भाई शरीर व मन दोनों हि चलायमान है किसी भी काम कों जम कर करने की इच्छाशक्ति आप में नही है,उम्र के ४५ वै साल तक नसीब मंदा रहेगा और ४५ वै वर्ष के बाद जो भाई सरीखे दोस्त यार है वो मतलब न रखे|इसके लिए लाल किताब एक उपाय बताती है जो निचे लिख रहा हू |
इसका उपाय लालकिताब कहती है कि शनिश्चर के पत्थर कों बृहस्पत के जर्द फूलो से बतौर उपाओ मुअत्तर करे तों हर तरह की मदद मिलेगी |

आपके टेवे में विपुल जी शनि और राहू कि युति है जो खाना न. ४ में मौजूद है जिसे लालकिताब ने शनिचर साप और राहू उसके मस्तक में रहने वाली मणि है लालकिताब के अनुसार आपके शरीर पर लहसन का निशाँ या मस्सा होना है तों तों लालकिताब ये कहती है कि बुजर्गो कि दौलत और शान मिलेगी मगर वो दौलत व शान कों सूरज के ग्रहण की तरह बर्बाद करदेगा मतलब साफ़ है कि शरीर पर लहसन होने से टेवे में मोजूद आपके तमाम ग्रहों कों ग्रहण लगेगा |
जिसके कारण आपके खाना न. ४ में मौजूद यह युति माँ के सुख कों कमजोर करती है और संतान के सुख कों भी कमजोर बनाती है इस लिए संतान की उत्तमता के लिए आप ये परहेज और उपाय तमाउम्र करे –
रात मे या पक्की शाम या शनिवार के दिन, वीरवार की पक्की शामके वक्त बादाम नारयल का आग में जलाना या भूनना या तेल में तलना राहू और शनिचर के अच्छे परिणामों कों बिगाड देगा और रद्दी हालत पैदा करेगा खासकर कढ़ाई में रखकर आग एम् जलाना और भुनना तों निहायती बुरा और मंदअसर देगा |
आपका विपुल जी चंद्रमा खाना ८ में है जिसे लालकिताब इस तरह से फरमाती है कि चंद्रमा किसी तरह से भी मंदा हो मगर टेवे वाले यानि कि आप आपकी खानदानी नस्ल कभी बंद नही होगी मतलब कि वंश बेल सदा चलती रहेगी |जब चन्द्र ८ में हो तों शनि आप कों ये दिखने वाला बनाता है कि आप बड़े रोशन दिमाग भलमनसाहत वाले अपने कों दिखाते है जबकि अंदर से कपट की खान और गंदे नाली के पानी की किस्मत का मालिक मुकर्रर करती है ये लालकिताब एक ख़ास बात और कि जिसका चंद्रमा ८वे में हो जेसा कि आपका है जद्द्दी जायदाद और शुकर के काम{ यानि कि जमीन और औरत } उसके अपने काम न आएगे और सिर्फ उस पर हावी हि होते रहेंगे |अगर आपके घर के पास विपुल जी कुआ या तलाब या पानी का कोई भी जरिया नजदीक हो {लगभग ४०० मीटर के दायरे में }तों जिंदगी और भी मंदी साबित होगी | सबसे पहली निशानी माँ की उम्र कम होगी |दूसरी चालचलन मंदा होगा |सुसराल में भी चंद्रमा के मंदे का असर होगा जससे केतु यानि साले कि जन्दगी में औरत यानि शुक्र सकूनसे नही रहने देगी | इसके लिए लालकिताब ये उपाय कहती है कि-
यदि औलाद कों ठीक रखना है तों शमशान के अंदर मौजूद कुएँ का पानी लाकर अपने घर में रखना आपके लिए मददगार होगा |
श्राद्ध में बुजुर्गो के नाम पर दूध का दान न दे |
किसी भी जोहरी से किसी भी काम का गठबंधन या खुद जोहरी का काम किया तों बदबख्ती होगी|
घर में चंद्रमा की वस्तुए का होना लंबी उम्र कि निशानी होगी |बदजुबानी यानि दूसरों के लिए गलत शब्दों का प्रयोग मसलन बुराई करना सरकारी मुलाजिमों से परेशान करा देगा |
विपुल जी लालकिताब में शुक्कर खाना दो में है जो बया करता है कि जिस घर में तुम्हारा रैनबसेरा होगा वो गली के या तों पाच मकान छोडकर होगा या वो गली तंग होगी और आखिर का मकान होगा या दोनों हालातों कों एक साथ बँया करता होगा | मकान का एक रास्ता दक्षिण कि और खुलता है जिसका इस्तमाल नुक्सान देगा |
शुक्र का खना २ में होना दूजो के लिए कि गयी बुराई आके स्वयं के लिए हानि कारक होगी जो शुक्र के फल कों मंदा करेगी |आजीविका ,धन व संतान में यदि ये ऐब न किया तों ६० वर्ष तक वृद्धि हो |शुक्र विपुल भाई आपको दुनयावी व रूहानी {सांसारिक और आत्मिक } प्रेम का रसिक बनाती है यानि कि बगुला भगत जिसका किसी भी पूजा में मन नही रमपता,शुक्रके कारण गृहस्त सुख ठीक रहेगा |पिता का धन जो आपका टेवा बतलाता हैकि आप कों प्राप्त होगा आप सम्भाल पाओ या न पाओ इसकी कोई शर्त नही |
परहेज :-
शुक्र कों ठीक रखे अन्यथा गुप्त रोग् होने की सम्भावना बनेगी
उपाय :-
मंगल कि वस्तुओ का प्रयोग करे ,सहायक होगी |
अपना चालचलन ठीक रखे |
२०० ग्राम गाय का पीला घी धर्मस्थल में दान दे |

इसी के साथ मैं अपनी लेखनी कों विराम देता हू |ईश्वर आप कों खुश रखे और नेक ख्यालात से नवाजे ताकि आप खुश रहे दूसरों कों भी खुश रखे |

|| हरि ओइम तत्सत ||

माता बंगलामुखी मंत्र :
“ॐ ह्लीँ बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं। स्तंभय जिह्वा कीलय बुद्धि विनाशय ह्लीँ ॐ स्वाहा”

इसको नित्य करने की आवश्यकता नहीं है, पर्वादि में या पुरश्चरण काल में अवश्य करना चाहिये ।

विनियोगः ॐ अस्य श्री उत्कीलन मंत्रस्य सदाशिव ऋषिः, वृहत् गायत्रीछंदः, सूचीमुख्यै देवता, ॐ ऐं क्लीं ह्लीं ह्लीं ऐं अं बीजाय, ब्रह्म-ग्रंथिं उत्कीलय शक्तिः, ॐ ब्लूं ह्लौं ह्लं ह्लीं ह्लां ॐ कीलकं, श्रीं बगलामुखी मंत्र उत्कीलनार्थे जपे विनियोगः।

ऋष्यादि-न्यासः- उत्कीलन मंत्र सदाशिव ऋषिः नमः शिरसि , वृहत् गायत्री छंदसे नमः मुखे, सूचीमुख्यै देवता, श्री ब्रह्मास्त्रोत्कीलनायैक्लीं ब्लूं ग्लौं ह्लीं ग्लौं ब्लूं क्लीं सं सं सूच्यग्रेणोत्कीलन सूचीमुख्यै देवतायै नमो हृदये । ॐ ऐं क्लीं ह्लीं ह्लीं ऐं अं बीजाय नमो गुह्ये, ॐ ह्लीं अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लृं ॡं एं ऐं ओं औं अं अः (तीन बार कहकर मूलमंत्र का उच्चारण करें) ॐ ऐं ह्लीं ह्लीं ह्लीं ऐं ओं ब्लीं सं सं सं रुद्रसूच्यग्रेण ब्रह्म-ग्रंथिं उत्कीलय ॐ अं ह्लीं आं इं ब ईं ग उं लाऊं मु ऋं खि ॠं स लृं र्व ॡं दु एं ष्टा ऐं नां ओं वा औं चं अं मु अं खं अः प अं दं औं स्त ओं म्भ ऐं य एं जि ॡं ह्वां लृं की ॠं ल ऋं य ऊं बु उं द्धिं ईं वि इं ना आं श अं य ह्लीं ॐ क्षं ॐ स्वाहा । ॐ ऐं क्लीं क्लीं ह्लीं क्लीं ऐं ओं ब्लीं सं सं सं रुद्रसूच्यग्रेण ब्रह्मग्रंथिं उत्कीलय उत्कीलय, ॐ ब्लूं ह्लौं ह्लंह्लीं ह्लां ॐ कीलकाय नमो नाभौ । ॐ ह्लीं ह्लीम ह्रसौं श्रीं बगलामुखी महा-मंत्रे उत्कीलनार्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे।

इसके पश्चात् – ॐ ऐं ह्लीं ह्लीं ह्लीं ऐं ओं ब्लीं सं सं सं रुद्रसूच्यग्रेण ब्रह्मग्रंथिंउत्कीलय उत्कीलय से व्यापक न्यास करें।

षडङ्ग-न्यास कर-न्यास अंग-न्यास
ॐ इं लं हंसः ह्लां सोहं लं ईं ॐ उत्कीलिन्यै नमः अंगुष्ठाभ्यां नमः हृदयाय नमः
ॐ इं लं हंसः ह्लीं सोहं लं ईं ॐ महोत्कीलिन्यै नमः तर्जनीभ्यां नमः शिरसे स्वाहा
ॐ इं लं हंसः ह्लूं सोहं लं ईं ॐ रुद्रसूच्या उत्कीलिन्यै नमः मध्यमाभ्यां नमः शिखायै वषट्
ॐ इं लं हंसः ह्लैं सोहं लं ईं ॐ ब्रह्मग्रंथिं उत्कीलिन्यै नमः अनामिकाभ्यां नमः कवचाय हुं
ॐ इं लं हंसः ह्लौं सोहं लं ईं ॐ योगिन्यै उत्कीलिन्यै नमः कनिष्ठिकाभ्यां नमः नेत्र-त्रयाय वौषट्
ॐ इं लं हंसः ह्लः सोहं लं ईं ॐ सर्वोत्कीलिन्यै नमः करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः अस्त्राय फट्

ध्यानम्

रुद्रसूचीमुखीं ध्याये सर्वाभरण-भूषिताम्।
वरदाऽभयसूच्यग्र नखदंष्ट्राभयानकाम्।।
चतुर्भुजां त्रिनयनां वरदाऽभय कुण्डिकाम्।
शूलाग्रान् खरतीक्ष्णग्रान् कुर्वतीं ग्रथिताक्षरान्।।
वर्णमाला विभूषांगी सर्व-वर्णात्मिकां शिवाम्।
प्रोद्यश्वतां मनून् सर्वान् नानावर्ण विजृंभितान्।।
विविच्य वरदे मंत्रान् मालायां कुसुमानिव।
प्रवेशय मनुं देहि प्रकटीकुरु सर्वदा।।
अभयं टंक वरदं पाशं पुस्तकमंकुशम्।
शूलं सूच्यग्रमादाय देहि मे प्रणमामि त्वाम्।।
इति ध्यात्वा जगद्धात्रीं जगदान्दरुपिणीम्।
ग्रंथित्रय विशेषज्ञं शिवं ध्यात्वाजपेन्मनुम्।।
ॐ इं लं हंसः ह्लीं उत्कीलिन्यै नमः। ॐ ईं लं हंसः ॐ वः ॐ ह्लीं बगलामुखि (पूरा मंत्र) ह्लीं लं ईं वः उत्कीलिन्यै स्वाहा। ॐ ईं हंसः रं सं रं ह्लः ..मूल मंत्र .. ॐ ईं लं हंसः हं वः उत्कीलिन्यै स्वाहा। यह तीन बार जपे। पुनः अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लृं ॡं एं ऐं ओं औं अं अः कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं ळं क्षं ॐ ईं हंसः ॐवः … मूलमंत्र … ॐ वः सः हं लं इं लं क्षं लं हं क्षकार से अकार तक विलोम-मातृका उच्चारण करें ॐ वः ह्लां इं लं हंसः … मूलमंत्र … सोहं लं ईं ॐ वः उत्कीलिन्यै स्वाहा।
जागरणः- ॐ इं लं हंसः सोहं ॐ वः वः वःॐ हंसः सोहं लं ईं ॐ मम हृदये चिरं तिष्ठ तिष्ठ स्वाहा हृदय पर हाथ रख कर ३ बार जपे। पुनः ॐ ह्लीं हंसः .. मूलमंत्र .. ॐ अं अः …… अं अः हंसः ह्लीं ॐ जप करे।

मंत्र-शुद्धिः

अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लृं ॡं एं ऐं ओं औं अं अः कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं ळं क्षं ॐ ह्लीं हंसः सोहं ह्लीं सः सोहं मूल मंत्र पश्चात् क्षं लं हं ……… आं अं विलोम-मातृका मम विद्याशुद्धिं कुरुकुरु स्वाहा।

शाप-विमोचनः

ॐ ह्रूं ह्रूं ह्रूं क्लीं क्लीं क्लीं ऐं ऐं ऐं ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्रीं क्रीं क्रीं रुद्रसूच्यग्रेण उत्कीलय उत्कीलय अंआं …….. अं अः बगलाशापोद्धारं कुरु कुरु अं आं …….. अं अः क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ऐं ऐं ऐं क्लीं क्लीं क्लीं ह्रूं ह्रूं ह्रूं ॐ रुद्रसूच्यग्रेण बगलाशापविमोक्षं कुरु कुरु स्वाहा। मूल मंत्र का आठ बार जप करे। ब्राह्मी-मुद्रा दिखायें । अन्य पञ्च-मुद्राओं से नमस्कार करें।

अन्य उत्कीलन विधि :
(१) ॐ ह्रीं क्लीं स्वाहा जपने से उत्कीलन होवे।
(२) ॐ ह्रीं स्वाहा अथवा ह्रीं ॐ स्वाहा जपने से संजीवन होवे।
(३) ॐ ह्रीं बगले रुद्रशाप विमोचय ह्रीं ॐ से शापोद्धार होवे।
(४) क्रीं ह्रीं क्लीं से मूल मंत्र को संपुटित करे तो विद्या का जागरण होवे।

मंत्र साधना के लिए निम्नलिखित विशेष समय, माह, तिथि एवं नक्षत्र का ध्यान रखना चाहिए।

1. उत्तम माह – साधना हेतु कार्तिक, अश्विन, वैशाख माघ, मार्गशीर्ष, फाल्गुन एवं श्रावण मास उत्तम होता है।

2. उत्तम तिथि – मंत्र जाप हेतु पूर्णिमा़, पंचमी, द्वितीया, सप्तमी, दशमी एवं ‍त्रयोदशी तिथि उत्तम होती है।

3. उत्तम पक्ष – शुक्ल पक्ष में शुभ चंद्र व शुभ दिन देखकर मंत्र जाप करना चाहिए।

4. शुभ दिन – रविवार, शुक्रवार, बुधवार एवं गुरुवार मंत्र साधना के लिए उत्तम होते हैं।

5. उत्तम नक्षत्र – पुनर्वसु, हस्त, तीनों उत्तरा, श्रवण रेवती, अनुराधा एवं रोहिणी ‍नक्षत्र मंत्र सिद्धि हेतु उत्तम होते हैं।

हमारे जीवन की हर एक समस्या का निवारण मात्र भगवान की प्रार्थना से ही संभव है। कर्मों के साथ ही भगवान की कृपा प्राप्त होने पर मुश्किल कार्य भी आसानी से पूर्ण हो जाता है। सुख-शांति बनी रहे इसके लिए सभी के घरों में भगवान का एक मंदिर अवश्य ही रहता है। घर के मंदिर में कौन से भगवान की कितनी प्रतिमाएं रखनी चाहिए? सभी के घरों में भगवान के लिए भी यथाशक्ति अलग घर या मंदिर अवश्य होता है। मंदिर में अपने इष्ट देव की मूर्ति, तस्वीर, पूजा का अन्य सामान रखा जाता है। भगवान की मूर्तियों की संख्या के संबंध में ये विशेष बातें शास्त्रों में बताई गई हैं-

- घर के मंदिर में श्रीगणेश की 3 प्रतिमाएं नहीं होना चाहिए। गणपति की मूर्ति होना जरूरी है लेकिन इनकी मूर्तियों की संख्या 3 नहीं होना चाहिए। गणेशजी की मूर्तियों की संख्या 3 अशुभ मानी जाती है।

- मंदिर में दो शिवलिंग नहीं होना चाहिए तथा शिवलिंग अंगूठे के आकार का होना चाहिए। घर के मंदिर में एक ही शिवलिंग रखना श्रेष्ठ फल देता है। एक से अधिक शिवलिंग रखना शास्त्रों के अनुसार वर्जित है।

- किसी भी देवी या माताजी की 3 प्रतिमाएं नहीं रखें। इनकी संख्या भी 3 नहीं होना चाहिए।

कौनसा बच्चा सुंदर होगा-

सबसे पहले यदि हम शारीरिक कद-काठी व नाक-नक्श का विचार करें तो यह कहा जायेगा कि लग्न, नवांश लग्न में शुभ ग्रहों (गुरू, शुक्र, बुध, पूर्ण चंद्र) की राशियां हों और लग्न स्वामी ग्रह बलवान हों। लग्न में स्थित शुभ ग्रह भी शरीर को लावण्यता देते हैं। सूर्य, शनि, मंगल व राहु-केतु अपेक्षाकृत कठोर ग्रह हैं और ये देह को कठोरता व मजबूती तो दे सकते हैं परंतु कोमलता व सौम्यता नहीं दे सकते। बिना कोमलता व सौम्यता के देह विचित्र सी लगती है।

जैसे किसी व्यक्ति का उन्नत व विस्तृत ललाट जो कि किसी भी चोट के निशान से रहित हो, उसके भाग्यशाली होने व सूर्य के बलवान होने का स्पष्ट लक्षण है, लेकिन सूर्य जब कुपित मंगल से पी़डत हों तो ललाट पर चोट के निशान पाये जाते हैं। जन्मकुण्डली में बलवान सूर्य ललाट पर जोरदार चमक पैदा करते हैं। कुछ व्यक्ति का ललाट इतना अधिक उन्नत होने लगता है कि उनके सिर से बाल भी कम हो जाते हैं। चेहरे की त्वचा का तना हुआ रहना भी बलवान सूर्य का लक्षण है लेकिन चेहरा अपेक्षाकृत थो़डा सा ब़डा भी हो जाता है। कालपुरूष के सिर व मुख पर सूर्य का अधिकार है।

गोल व मोटी आँखें चंद्रमा की निशानी हैं। कालपुरूष के ह्वदय पर चंद्रमा का अधिकार है। ह्वदय की विशालता या मनुष्य की सहजता का अनुमान उसकी आँखों से लगाया जा सकता है। मोटी आँखें जो नीलिमा लिए हों और आद्रüता भरी हों तो यह चंद्रमा का ही प्रभाव है लेकिन आँखों में गजब की चमक सफेदी लिए हो परंतु आँखों में थो़डा भेंगा या टेढ़ापन हो तो यह बली शुक्र की निशानी है। शुक्र अभिनय के कारक हैं और जितनी भी सफल अभिनेत्रियाँ या अभिनेता हैं उनकी आँखों में टेढ़ापन देखा जा सकता है, वे जो कि आइटम कलाकार के रूप में ख्यातनाम हुए हैं लेकिन जो चरित्र अभिनेता हुए हैं, उनकी आँखों पर चंद्रमा का प्रभाव रहा।

जिन जातकों की कुण्डली में सूर्य, शुक्र और चंद्रमा बलवान होते हैं और जन्म लग्न पर उनका प्रभाव होता है, उनमें शानदार आकर्षण होता है। चेहरे पर चमक सूर्य देव प्रदान करते हैं। आंखों में आकर्षण चंद्रमा व शुक्र दोनों ही ला सकते हैं और त्वचा का गुलाबीपन व लावण्यता मंगल के कारण आती है।
ये तीन ग्रह जिनकी कुण्डली में बलवान होते हैं वे बिना शंृगार या मेकअप के भी सौंदर्य छटा बिखेर देते हैं। शरीर की लंबाई और गर्दन व अंगुलियों की लंबाई भी सूर्य के अधीन होती है क्योंकि सूर्य अस्थियों के कारक हैं। सुंदरता की आधारशिला व्यक्ति की लंबाई व उसका मोटापा होता है। सूर्य प्रधान व्यक्ति मोटापे का शिकार अपेक्षाकृत कम ही होते हैं।

||ओइम श्री ऋद्धि सिद्धि सहिताय श्रीमन् महा गणाधिपतिय नमः||

लालकिताब ज्योतिष की एक महत्वपूर्ण विधा है, और व्यक्ति कों सही प्रकार से भविष्य में होने वाली घटनाओं के प्रति सचेत करती है| लालकिताब की मुख्य विशेषताओं में मुख्य तत्व यह है कि लालकिताब के द्वारा आप कुछ उपायों कों करके और कुछ परहेज करके अपने साथ होने वाली अशुभ घटनाओं कों चाहे वो वर्तमान में चल रही हो या भविष्य में आने वाली हो, से मुक्ति प्राप्तकर अपने जीवन में खुशियों का संचार कर सकते है | हमारे संस्थान में लालकिताब के दो विशेष विशेषज्ञ आचार्य श्री राजीव लम्बा जी व आचार्य श्री अंकित कुमार धीमान जी अपने बहुमूल्य अनुभवों से लालकिताब कों और सुंदर ढंग से व सरल रूप से आपलोगों के लिए प्रस्तुत किया है |

संस्थान के द्वारा लालकिताब के टेवे अर्थात जन्मपत्रिका कों कुछ अलग अलग माडल में प्रस्तुत किया गया है ताकि आप अणि सुविधा अनुसार बनवा सके -

१- लालकिताब दृष्टि — 551रुपये

इसके अंतर्गत लालकिताब का टेवा,आपके टेवे में मौजूद लालकिताब के ऋण,विभिन्न प्रकार के टेवे और लालकिताब से आपके बारे में सम्पूर्ण सामान्य जानकारी जिसमे आपके व्यक्तित्व आपके जीवन के विषय में जानकारी है और ग्रहों के विषय में जानकारी व उपाय |
२-लालकिताब विशेष दृष्टि——1100रुपये

इसके अंतर्गतलालकिताब का टेवा ,उसमे मौजूद ऋण व भार,लालकिताब के अनुसार आपके टेवे में मौजूद ग्रहों के अनुसार आपके हाथों में रेखाओं की स्थिति,लालकिताब से आपके बारे में सम्पूर्ण सामान्य जानकारी जिसमे आपके व्यक्तित्व आपके जीवन के विषय में जानकारी है प्राचीन पद्धति के द्वारा टेवे में मौजूद 9 ग्रहों का विस्तृत फलित व उपाय व परहेज जिनके द्वारा आप अपने प्रतिकूल ग्रहों कों अपने अनुकूल कर लाभ ले सकते हो | एक वर्ष का वर्षफल भी इसके साथ संलग्न है |

३-लालकिताब जीवन सोपान —— 1551 रुपये
इसके अंतर्गतलालकिताब का टेवा ,उसमे मौजूद ऋण व भार,लालकिताब के अनुसार आपके टेवे में मौजूद ग्रहों के अनुसार आपके हाथों में रेखाओं की स्थिति,लालकिताब से आपके बारे में सम्पूर्ण सामान्य जानकारी जिसमे आपके व्यक्तित्व आपके जीवन के विषय में जानकारी है प्राचीन पद्धति के द्वारा टेवे में मौजूद 9 ग्रहों का विस्तृत फलित व उपाय व परहेज जिनके द्वारा आप अपने प्रतिकूल ग्रहों कों अपने अनुकूल कर लाभ ले सकते हो |
35 वर्ष कि वर्षकुंडली |आधुनिक व नए तरीके से लालकिताब के अनुसार आपके ग्रहों से आपका फलित और उपाय |
लालकिताब से आपके लिए विशेष फलित जो जो आपके जीवन में बहुत उपयोगी रहे जेसे कि वास्तु के टिप्स लालकिताब के अनुसार और अनुकूल व प्रतिकूल दिशा कौन सी है किस तरह के मकान में रहे जिससे ग्रह और अनुकूल बने और आपके जीवन में उन्नति हो आदि ऐसी बहुत सी जानकारी |
3 वर्ष का वर्षफल इसके साथ |

४-लालकिताब सोपान विशेष —- 2100 रुपये

इसके अंतर्गतलालकिताब का टेवा ,उसमे मौजूद ऋण व भार,लालकिताब के अनुसार आपके टेवे में मौजूद ग्रहों के अनुसार आपके हाथों में रेखाओं की स्थिति,लालकिताब से आपके बारे में सम्पूर्ण सामान्य जानकारी जिसमे आपके व्यक्तित्व आपके जीवन के विषय में जानकारी है प्राचीन पद्धति के द्वारा टेवे में मौजूद 9 ग्रहों का विस्तृत फलित व उपाय व परहेज जिनके द्वारा आप अपने प्रतिकूल ग्रहों कों अपने अनुकूल कर लाभ ले सकते हो |
35 वर्ष कि वर्षकुंडली |आधुनिक व नए तरीके से लालकिताब के अनुसार आपके ग्रहों से आपका फलित और उपाय |
लालकिताब से आपके लिए विशेष फलित जो जो आपके जीवन में बहुत उपयोगी रहे जेसे कि वास्तु के टिप्स लालकिताब के अनुसार और अनुकूल व प्रतिकूल दिशा कौन सी है किस तरह के मकान में रहे जिससे ग्रह और अनुकूल बने और आपके जीवन में उन्नति हो आदि ऐसी बहुत सी जानकारी |
लालकिताब के अनुसार आपकी कुंडली में मौजूद ग्रहों की युति व दृष्टि के अनुसार विशेष फल जो आपके जीवन में क्या लाभ व नुक्सान करसकती है और इसे किस प्रकार अपने अनुकूल करे ताकि आपका जीवन सुंदर और अच्छा बने | 5वर्षों का वर्षफल इसके साथ |

५-लालकिताब सर्वस्व ——3100रुपये
इसके अंतर्गत लालकिताब के अनुसार आपकी समस्त जानकारी आपके ग्रहों का विस्तृत विवेचन व उनके अनुकूल व अपने पक्ष में ग्रहों कों करने के उपाय प्राचीन व नवीन विधियों से ,ऋण व भार कों उतारने के उपाय, टेवा किसप्रकार का है और इसेमें मौजूद ग्रहों कों किस प्रकार सही करे कि कोई भी ग्रह आपके प्रतिकूल न हो, शनि की साढ़ेसातीसे के बुरे प्रभावों कों कम करके अपने फायदे के लिए अनुकूल बनाने के उपाय ,टेवे में मौजूद दोषों जेसे कालसर्प आदि के सरल उपाय ,मांगलिक दोष है कि नही और इसके प्रभाव कों केसे कम करे आदि |लालकिताब की दशा अंतर्दशा का5 वर्ष तक का फलित व उपाय परहेज सहित ताकि आप अपनी दशा व अन्त्र्दाशाको सही व अपने अनुकूल रख सके |5 वर्षों का वर्षफल लालकिताब के अनुसार वास्तु व जीवन में बहुत से महत्वपूर्ण अवसरों पर लाभ लेने के लिए विस्तृत विवेचन व उपाय ताकि आप सभी प्रकार से लाभ अर्जित कर सके |यदि आप अधिक समय का वर्ष फल व दशा अंतर्दशा का फलित व उपाय चाहते है तों संस्थान से संपर्क करे |

Two Ways to Use
Therapeutic Gemstone Necklaces

Gemstone energy medicine offers a wide range of therapeutic tools based on the gemstone sphere. It also offers many techniques for using rounded gemstones therapeutically. One of the most powerful ways to experience the healing properties of gems is to string them together in the form of a necklace. A therapeutic gemstone necklace is a highly versatile tool that you can use in two primary ways: (1) you can wear it around your neck for profound overall benefits, or (2) you can place it on specific parts of your body to focus the gemstones’ therapeutic effects.

1.

Wearing the necklace around your neck

When you wear a necklace of gemstone spheres around your neck, their energies radiate in all directions, deeply penetrating your body and aura, or energetic field. There, the gems work on neutralizing the energetic blockages that limit positive growth and lead to ill health. At the same time, the gemstones’ energies uplift and nourish all aspects of your being to energize and inspire you, enhance your health, and make enduring changes.

The advantages of using therapeutic gemstones in this way are many. A gemstone-sphere necklace worn around your neck silently works for you as you go about your daily activity and even when you’re sleeping at night. The gemstones work continually and ever more deeply on that which holds you back from the health, happiness, and well-being you desire.

2.

Placing the necklace on an area of your body

While wearing a therapeutic necklace around your neck is a powerful and convenient way to enjoy its benefits, it is just one way to experience them. In most cases, you can use the same necklace in other ways to focus the gemstones’ energies for various purposes.

Let’s take Carnelian as an example. Among its many therapeutic actions, this deep-orange gemstone vitalizes and detoxifies the body’s cells. When you wear a therapeutic Carnelian necklace around your neck, the gemstones’ energies are diffused throughout your body and aura. Areas in need of Carnelian’s support spontaneously take advantage of the gemstones’ energies.

However, you can also place a Carnelian necklace on a specific area of your body to direct its healing energies there. For example, you can curl up a Carnelian necklace and place it on your liver. This will focus the gemstones’ cleansing and revitalizing energies primarily on the liver, and very little of those energies will be distributed to other parts of your body. Your liver will receive the full benefit of the Carnelian energy, thus accelerating and enhancing the liver’s healing. This is one simple example of how you can apply gemstone spheres in ways that focus the gemstones’ effects.

You can also apply therapeutic gemstone necklaces in many other ways for a myriad of focused therapies. For example, you can place certain necklaces around your head or on your chakras, palms, or soles of your feet to produce specific results. Still other ways to use necklaces include contemplative and diagnostic techniques¾ways to reveal the causes of a condition and thus take the first steps toward healing it.

For instructions on how to perform focused therapies with Gemisphere’s therapeutic necklaces, do the following: On each necklace’s dedicated page, click the Therapies links under Learn More.

(Note: Not all necklaces have therapy instructions. If a necklace does not have an associated therapy, no Therapies link will appear on the dedicated page.)

Enhancing Your Experience
of Therapeutic Gemstones

Here are some additional suggestions for getting the most from your therapeutic gemstone necklaces:

Wear the necklace continually.

When working with a therapeutic gemstone necklace, it is most effective to keep it in your aura constantly—no more than three feet away from your body. This will allow the gemstones to maintain a strong energetic connection with your body and aura.

During the day

Wear the necklace at all times during the day, except when bathing, swimming, or performing vigorous physical activity, such as exercise.

While sleeping

If the necklace is longer than 20 inches, to prevent thread breakage, take the necklace off and lay it in the bed next to you or on a nearby nightstand.

Cleanse the necklace regularly!

As therapeutic gemstones help us release energetic impurities and blockages, some of these released energies cling to the surface of the gemstones. These disharmonious energies quickly build up on the surface of the gems, inhibiting their ability to work at peak capacity.

Regular cleansing clears these energies and restores the gemstones to their naturally vibrant state. Several minutes of care given regularly will keep your therapeutic gemstones vital and ready to help you take your next step in growth and healing.

Click here for simple gemstone care and cleansing instructions.

Practice presence when you put on a necklace.

With therapeutic gemstones, as with all energy medicine therapies, your intent and openness to change can assist the healing process. By consciously cooperating with the process of change initiated by the gemstones, you can greatly enhance their effects. We call this practicing presence. Presence is the quality of being fully in the moment, when the mind is not divided by thinking about other things.

To practice presence with therapeutic gemstones, introduce them to your body and aura with openness, gratitude, and the clear intent to experience the gems’ benefits. When you put on a new therapeutic necklace or one that you haven’t worn for a while, bring it into your aura with a brief procedure that will deepen your connection with it:

1.

Hold the necklace in your hand and gaze at it for a few moments. Allow its color and energy to enter your being through your eyes. Drink in its essence.

2.

Welcome the necklace’s energy. Open your heart and all aspects of yourself to the gemstones’ energy. Acknowledge your willingness to change and to accept the process of healing and release.

3.

3. Introduce the gemstones to your body by touching the necklace to three therapeutic windows for a few seconds each:

The navel

Acupuncture point SP 21 on the left side of your body only (at nipple level under the armpit)

Acupuncture point CV 21 (1.5 inches below the throat notch in the upper breastbone)

4.

Hold the necklace directly in front of your chest at arm’s length, and very slowly bring it to your heart. As you do, energetically breathe in the gemstones’ energy. Hold the gemstones on your heart for a moment, and let their energy penetrate even more deeply.

5.

Place the necklace around your neck.

Wearing Multiple Necklaces:
The Rule of Three

We recommend wearing a maximum of three therapeutic gemstone necklaces at one time. Wearing more than three necklaces simultaneously can provide too many energetic influences for you to absorb effectively.

Ideally, when wearing multiple necklaces, they should be of different lengths, so that your body and aura can interact with each necklace clearly. A solid Lavender necklace is the one exception: it can be worn in the same length as another necklace, and it can be worn as a fourth necklace.

Selecting Necklaces to Wear

Here are two approaches you can use to choose which necklaces to wear on a given day. No matter how many necklaces you have, you can adapt these two approaches to your personal gemstone pharmacy.

Approach 1: Daily fine-tuning

In this approach, you fine-tune which necklaces you wear each day as your needs and goals change. For example, if you’re going through an emotionally turbulent time, you might want to put on Rhodonite for a few days. If you feel a cold coming on, you can wear Bloodstone or Carnelian. If you want to enhance your creativity for a special project, you can use Aquamarine. If you’re entering a potentially negative environment, you can put on Rubelle. These are just a few examples.

If you are adept at an answer-receiving technique, such as muscle testing, you can use the technique to determine which necklaces to wear each day. You can also use your knowledge of the gemstones’ therapeutic action or follow your intuition about what is best on a daily basis.

Approach 2: Focusing on an issue

If you wish to address a more deep-seated issue or condition, and you’ve obtained one or more therapeutic necklaces to help meet your goal, it’s advisable to wear those necklaces for a prolonged period—i.e., several weeks or months. This will allow the gemstones’ energies to work continually on ever more deeply seated blockages and energetic patterns to root out the causes of the condition or issue and make profound changes.

This doesn’t mean that you can’t remove the necklace for a while if another, more acute need arises. In addition to the examples above, you could put on a Blue Sapphire necklace for a day or two if you want to improve your mental clarity for a special occasion. If you want to accelerate the effects of a meditation or other spiritual practice, you could temporarily wear a Riverstone necklace. If you’ll be traveling for several hours, you can put on an Agate necklace for the day, and so on.

Caring for Your Therapeutic Gemstones

Your Gemisphere necklaces are fragile and sensitive energetic tools. In addition to regular cleansing, they require some special care to maintain their vitality and effectiveness. With proper care, most therapeutic gemstones will continue producing their therapeutic benefits indefinitely.

Basic Care Guidelines

When not in use, store cleansed gemstones in a drawer, covered container, or jewelry roll.

Handle all therapeutic gemstones with care. Some are particularly fragile, such as Purple Rainbow Fluorite, Malachite, Mother of Pearl, and Rhodochrosite. Because they naturally break, scratch, and chip more easily than other gemstones, store them separately.

Practices to Avoid

Avoid storing gemstones near strong electromagnetic fields, such as those emitted by televisions and computers, which can disrupt the gemstones’ energies.

Avoid exposing gemstones to x-rays, such as at the dentist, in a hospital, or at an airport security station. X-rays will be absorbed by the gemstones and released later into the user’s aura.

Avoid wearing gemstones in chlorinated swimming pools or hot tubs. Chlorine weakens natural-fiber thread and adversely affects the surface of certain gems.

Avoid smoking and wearing synthetic perfume when wearing therapeutic gemstones, especially porous stones. The fumes can interfere with the free flow of a gemstone’s energy.

To Protect the Thread’s Longevity

To maximize the flow of the gemstones’ energies, we string most of our necklaces with natural-fiber silk thread, which is more prone to breakage than synthetic threads and requires careful handling. In the event that the thread does break, we offer repair and rejuvenation services, as well as the materials for repairing necklaces at home. For information about our repair and rejuvenation services, click here.

Do not wear necklaces longer than 20 inches to bed. Instead, lay them within three feet of your body.

During intense physical activity, such as jogging, remove your necklace and place it in a secure pocket.

In general, be sure that the thread is completely dry before wearing or storing a necklace. For example, you can rinse a necklace before you go to bed and leave it flat to dry within three feet of your body while you sleep.

Click here for more information on the care and cleansing of therapeutic gemstones.

To know More

To know more about how to get the most from your therapeutic gemstones, including how to select and use the best gemstones for you and your loved ones, we recommend to consult pt. ankit kumar dhiman ji .

If one wears gems to gain general good effects, they can be worn at any time, but in general the best times are in the morning (before noon) during Shukla Paksha (the bright half of the lunar month). If one is wearing a gem in order to offset the bad effects of planetary configurations, here are some suggested times as to the most effective times to wear the gems.

Read the chart according to this example: for general luck, red coral should be worn within one hour of sunrise on a Tuesday, during the phase of Mars. In the list, the first finger refers to the index finger, the second finger to the middle finger, the third finger to the ring finger, and the fourth finger to the little finger.

Setting in a Ring
Astrological gems are usually set either in a ring or a pendant. The gem’s effect is stronger if the setting has a hole in its back by which the gemstone can actually touch the wearer’s skin. Gemstones should be set in such a way as to allow light to pass through the stone into the body. Pendants are best worn over the heart or throat chakra.

Different gems should be set in different metals. Gemstones should be set in metal that naturally transmits the gem’s potency. Rubies, yellow sapphires, red coral, and their substitutes should all be set in yellow gold. Diamonds, blue sapphires, emeralds, cat’s eyes, and hessonites can be set either in white or yellow metals, but usually the white metals (silver, platinum, and white gold) are better. Pearls should always be set in silver, because silver has a cooling effect, which is good for the mind, while gold has a heating effect.According to some authorities, the metals ascribed to the planets are: gold for the Sun, silver for the Moon, brass for Mercury, silver for Venus, gold for Jupiter, and iron or steel for Saturn.

According to other authorities, it is copper mixed with gold for the Sun and Mars, silver for the Moon, Mercury, and Venus, gold for Jupiter, steel for Saturn, and an alloy of eight metals (Ashta Dhatu) for Ketu and Rahu. According to Western astrologers, silver is the best metal in which to set all gems.

Primary gemstones should be worn as rings or necklaces; secondary gemstones can be worn as rings, necklaces, bracelets, or earrings.

Finger To Wear On
It is best to wear primary gems as rings, so that the gem’s energy can be transmitted through the finger’s nerve. Each finger is governed by a specific planet, and is also related to certain parts of the body. Gemstones have more effect if they are worn on the proper fingers. If a particular gemstone is prescribed, and the planet that rules that gemstone is not related to a particular finger, then the gemstone should be worn on a finger ruled by a friend of that planet. The gem for one planet can be worn with the gem of another planet if the two planets are friendly.

For example, diamond, ruled by Venus, should be worn on the fingers of Venus’s friends—the middle finger (controlled by Saturn), or the little finger (controlled by Mercury). Cat’s eye and hessonite (gomedha) should be worn on the middle finger, because the planets that rule these two gemstones, Ketu and Rahu, are Saturn’s friends, and Saturn controls the middle finger. Many astrologers say that the right hand is the hand for men and the left for women.When a qualified astrologer prescribes a gem, it is important to ask him or her what finger it should be worn on.

Index finger—Jupiter controls the index finger (the finger next to the thumb). Yellow sapphire should be worn on this finger. Pearl, topaz, coral, and moonstone can also be worn on this finger. This finger relates to the stomach or respiratory system.

Middle finger—Saturn controls the middle finger. Blue sapphire, gomedha, and cat’s eye should be worn on this finger. Sapphire, moonstone, and white pearl can also be worn on this finger. The middle finger relates to the brain, mind, intestines, and liver.

Ring finger—The Sun controls this finger. Ruby, pearl, moonstone, red coral, and yellow sapphire should be worn on this finger. This finger relates to the stomach, blood circulation, kidneys, and respiratory system. This finger is next to the little finger. The gems for the Moon and Mars are also worn on this finger, as both the Moon and Mars are friends with the Sun. It is also said that Mars rules the thumb, and should be worn on the thumb.

Little finger—Mercury controls this finger. Wear emerald, green jade, diamond, and zircon on this finger. It relates to the legs, feet, and genitals.
Gemstone Metal Gem Weight in Carats Finger to Wear On Auspicious Time to Wear
Ruby Gold 2½ 3rd Sunday (4.30 pm – 6pm)
Pearl Silver 2 3rd Monday (7.30 – 9 am)
Red Coral Gold 6 1st or 3rd Tuesday (1.30 – 3 pm)
Emerald Gold or Silver 3 4th Wednesday (12 noon – 1.30 pm)
Diamond Gold or Silver 1½ 2nd & 4th Friday (10.30 am -12 noon)
Yellow Sapphire Gold 3 1st or 3rd Thursday (3 – 4.30 pm)
Topaz Gold 4 1st Thursday (3 – 4.30 pm)
Blue Sapphire Gold 4 2nd Saturday (9 – 10.30 am)
Cat’s Eye Gold or Silver 5 2nd Thursday (12 pm – 12 midnight)
Gomedha Hessonite Gold or Silver 6 2nd Saturday 12 pm – 12 midnight